स्वामी सहजानन्स रस्वती: एक स्वामी, जिन्होंने किसान आंदोलन की दिशा और दशा दोनों ही बदल दी

महाशिवरात्रि स्वामी सहजानन्द सरस्वती की 134 वीं जन्मतिथि है। वर्ष 1889 में इसी दिन गाजीपुर जिले के दुल्लहपुर रेलवे स्टेशन के पास एक छोटे से गाँव देवा में जन्मे नौरंगलाल के स्वामी सहजानन्द बनने की कथा आस्था पर विवेक, श्रध्दा पर विश्लेषण की जीत और खुद के अध्ययन तथा अनुभव से जीवन के प्रति दृष्टिकोण के विकास की जीती जागती कथा है।

स्वामी सहजानन्स रस्वती: एक स्वामी, जिन्होंने किसान आंदोलन की दिशा और दशा दोनों ही बदल दी

कॉमरेड बादल सरोज का लेख

संस्कृत और धर्मग्रंथों के प्रकाण्ड ज्ञानी एक धर्मालु स्वामी के सामाजिक बदलाव के प्रति समर्पित एक योद्धा और नायक बनने की दिलचस्प कहानी है। इसे पूरा पढ़ा जाना चाहिए ; इसके लिए स्वयं सहजानन्द सरस्वती की लिखी किताब मेरा जीवन संघर्ष में मूल्यवान सामग्री है। इसे अवधेश प्रधान जी के संपादन में ग्रन्थ शिल्पी ने प्रकाशित किया है।
 स्वामी सहजानन्द सरस्वती किसान आंदोलन को देशव्यापी नजरिया देने वाले, किसानो को आजादी की लड़ाई में शामिल करते हुए उन्हें सच्ची मुक्ति की लड़ाई के लिए तैयार करने वाले व्यक्ति थे। इन्ही की पहल और अध्यक्षता में 11 अप्रैल 1936 को लखनऊ में अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना हुयी और वह आगे बढ़ी – आज भी मौजूदा किसान आंदोलन की सबसे मजबूत और भरोसेमंद आधार बनी हुयी है।
 यहां स्वामी जी के पूरे विराट व्यक्तित्व और कृतित्व और योगदान को समेटना तो दूर उसे छुआ तक नहीं जा सकता। सिर्फ कुछ विलक्षण पहलू हैं जिनके बारे में इंगित किया जा सकता है।
 1914 में स्वामी जी ने “शास्त्रों के तंग दायरे से बाहर आकर सार्वजनिक जीवन के प्रवाह में प्रवेश किया” और एक ऐसी हलचल खड़ी कर दी जिसे इससे पहले इतने व्यापक पैमाने पर इस देश ने कभी नहीं देखा था। सोये हुए और अक्सर हताश तथा रोये हुए दिखने वाले किसानो को उन्होंने संघर्ष की अगली कतार में लाकर खड़ा कर दिया। वर्ष 1929 के आते आते सामंतों के खिलाफ यह लड़ाई इतनी बढ़ गयी कि पहले उसने बिहार प्रांतीय किसान सभा और उसके बाद 1936 में अखिल भारतीय किसान सभा का सांगठनिक रूप धारण कर लिया। दोनों ही के शिल्पी स्वामी सहजानन्द सरस्वती थे।
ध्यान देने की बात यह है कि यह सब काम वे उस दौर में कर रहे थे जब ग्रामों पर क्रूर सामंती निज़ाम का वर्चस्व था और उसकी हिमायत में सिर्फ अंग्रेज भर नहीं थे बल्कि उस जमाने के सबसे बड़े नेता गांधी भी थे। इन तीनो से एक साथ लड़कर आंदोलन खड़ा करना, इन तीनो के विरोध के बावजूद रास्ता तलाशना बड़ा काम था – जो उन्होंने सफलता के साथ किया। राष्ट्रीय स्वतन्त्रता के एजेंडे में किसानो और उनकी मांगों को शामिल करवाया।
 मगर वे यहीं तक नहीं रुके। अखिल भारतीय किसान सभा के स्थापना सम्मेलन के उदघाटन भाषण में ही उन्होंने साफ़ कर दिया कि “”किसान पूर्ण स्वतन्त्रता के हामी हैं और किसान सभा की लड़ाई किसानो-मजदूरों और शोषितों को पूरी आर्थिक राजनीतिक ताकत दिलाने की लड़ाई है। ” यह सिर्फ सत्ता हस्तांतरण तक सीमित मामला नहीं है।
 दूसरी बात जिसे उन्होंने ठीक ठीक समझा और जोर देकर कहा वह थी उनकी वर्ग दृष्टि ; उन्होंने कहा कि वर्गों में बँटे समाज में वर्गसंघर्ष ही परिवर्तन का जरिया है। वर्ग सहयोग या वर्ग समन्वय की समझदारी से कुछ भी हासिल नहीं हो सकता। एक वेदान्ती दण्डी स्वामी का इस समझदारी तक पहुंचना एक महत्वपूर्ण घटनाविकास था – जो उन्होंने समाज को समझने के वैज्ञानिक नजरिये से हासिल किया था।
 उन्होंने कहा था कि “किसानो की तात्कालिक राजनीतिक, आर्थिक मांगों के लिए संघर्ष करते हुए राजनीतिक सत्ता हासिल करने की लड़ाई लड़ी जाएगी। इस लड़ाई के केंद्र में हर तरह की जमींदारी व्यवस्था के खात्मे, लगान की समाप्ति, टैक्स प्रणाली में बदलाव कर उसका ग्रेडेशन, जमीन जोतने वाले को, भूमिहीनों को जमीन तथा कर्ज मुक्ति की मांगे रहेंगी। “
स्वामी जी की तीसरी महत्वपूर्ण धारणा राजनीति में धर्म की घुसपैठ से उनकी सख्त असहमति थी। वे मानते थे कि “धर्म एक नितान्त निजी मामला है। इसे सामाजिक और राजनीतिक विषयों से दूर रखना ही चाहिये। जो ऐसा नहीं करते, धर्म को राजनीति की सीढ़ी बनाते हैं वे न धार्मिक हैं न सामाजिक।” इन दिनों जारी किसान आंदोलन के लिए यह एक बड़ा सूत्र है। धर्म और सामाजिक चेतना के संबंध में स्वामी जी ने लिखा है कि ;
“प्रायेण देवमुनय: स्वविमुक्ति कामा:
मौनं चरन्ति विजने न परार्थनिष्ठां:
नैतान विहाय कृपणान विमुमुक्षु एको

नात्यत त्वदस्य शरणं भ्रमतोनुपश्ये !!”

 

(मुनि लोग स्वामी बनकर अपनी ही मुक्ति के लिए एकांतवास करते हैं। लेकिन मैं ऐसा हरगिज नहीं कर सकता। सभी दुखियों को छोड़ मुझे सिर्फ अपनी मुक्ति नहीं चाहिए। मैं तो इन्ही के साथ रहूँगा, जीऊँगा और मरूँगा।)
 यह स्वामी सहजानन्द सरस्वती थे जिनकी अध्यक्षता में अक्टूबर 1937 में कलकत्ता में हुयी अखिल भारतीय किसान सभा की सीकेसी बैठक ने लाल झण्डे को अपना झण्डा बनाया। इस बैठक में बोलते हुए स्वामी जी ने कहा था कि “मुक्ति की लड़ाई अकेले किसानो की नहीं है। इसकी धुरी किसानो, खेत मजदूरो, गरीब किसानो और मजदूरों की एकता है। इसलिए उनके औजार ही इस झण्डे के प्रतीक निशान होने चाहिए।” इसके लिए उन्हें न केवल दूसरों बल्कि समाजवादियों से भी जूझना पड़ा था।
 संगठन – व्यापक किसान संगठन – के बारे में स्वामी जी की समझ द्वंद्वात्मक थी। वे एक तरफ एकजुट और व्यापक किसान संगठन के हामी थे वहीँ इसी के साथ वे किसान सभा को राजनीतिक पार्टी या उसके संलग्नक में बदलने के पक्ष में नहीं थे। वे स्वयं राजनीतिक मोर्चे पर सक्रिय रहते हुए और किसानो सहित आम मेहनतकशों को राजनीतिक भूमिका निबाहने के लिए प्रेरित करते हुए भी, मानते थे कि व्यापक और सर्वसमावेशी किसान एकजुटता वाले संघर्षों में शामिल होकर, अपने तजुर्बों से ही किसान सही राजनीतिक निष्कर्ष और मुकाम तक पहुंचेगा।
 इसी के साथ वे मानते थे कि किसान सभा को असली पीड़ित किसानो का संगठन बनना चाहिए। वर्ष 1944 में अखिल भारतीय किसान सभा के सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए उन्होंने कहा था कि “मध्यम और बड़े किसान आज किसान सभा का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए कर रहे हैं जबकि हम उसका उपयोग सबसे गरीब और छोटे तबकों में वर्ग चेतना जगाने के लिए करना चाहते हैं। हमारे विचार में किसान वही हैं जो या तो भूमिहीन हैं या जिनके पास बहुत कम जमीन है। ऐसे ही सर्वहारा लोगों संगठन किसान सभा है और आखिर में वैसे ही लोग असली किसान सभा बनायेंगे। ” जमींदारों के खिलाफ स्वामी जी का मशहूर नारा था ‘ “कैसे लोगे मालगुजारी, लट्ठ हमारा जिंदाबाद !!”
ऐसे स्वामी सहजानन्द सरस्वती भारत के किसान आन्दोलन के पुरखे हैं – और जिनके ऐसे पुरखे होते हैं वे लड़ाईयों को जीतने तक जारी रखने का माद्दा रखते हैं।